नफरत के दौर में हमारी जिम्मेदारी

नफरत, हिंसा और असहिष्णुता के दौर में सोशल मीडिया और समाज का प्रतीकात्मक चित्रण

-डॉ. महेश सिंह लेखक गिरिडीह, झारखण्ड में शिक्षक और परिवर्तन पत्रिका के संपादक हैं।

नफरत, हिंसा और असहिष्णुता के दौर में सोशल मीडिया और समाज का प्रतीकात्मक चित्रण
बढ़ती असहिष्णुता, सोशल मीडिया के प्रभाव और सामाजिक संवाद की कमी के बीच शांति और सह-अस्तित्व की चुनौती।

आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसे अगर ‘बेचैनी का युग’ कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। सुबह की शुरुआत अखबारों और न्यूज चैनलों की उन सुर्खियों से होती है जिनमें कहीं न कहीं हिंसा, उन्माद या नफरत की दुर्गंध होती है। ऐसा लगता है गोया समाज की फिजाओं में एक अजीब सा तनाव है, जैसे बारूद का ढेर बिछा हो और बस एक चिंगारी की जरूरत हो। आखिर हम इतने असहिष्णु और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं? क्या वजह है कि इंसान की पहचान अब उसकी इंसानियत से नहीं, बल्कि भीड़ का हिस्सा होने से तय होने लगी है? हिंसा और नफरत का यह जो ज्वार हमारे चारों तरफ उमड़ रहा है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ है। यह एक धीमी और सुनियोजित प्रक्रिया का नतीजा है, जिसे कई तत्वों ने मिलकर सींचा है। इस गंभीर समस्या की तह में जाने के लिए हमें किसी एक कारण पर उंगली उठाने के बजाय उन तमाम सामाजिक, राजनीतिक और तकनीकी बदलावों को समझना होगा, जिन्होंने हमारी संवेदनाओं को कुंद कर दिया है।

सबसे पहले हमें उस तकनीकी क्रांति पर नजर डालनी होगी जिसे हम ‘सोशल मीडिया’ कहते हैं। यह विडंबना ही है कि जो तकनीक दुनिया को जोड़ने के लिए बनाई गई थी, आज वही हमें बांटने का सबसे बड़ा हथियार बन गई है। हमारे हाथों में मौजूद स्मार्टफोन अब संचार का माध्यम कम और नफरत फैलाने का औजार ज्यादा बन गए हैं। बिना सोचे-समझे, बिना तथ्यों की जांच किए संदेशों को फॉरवर्ड करने की जो बीमारी हमें लगी है, उसने झूठ को सच से ज्यादा ताकतवर बना दिया है। विद्वान मार्क ट्वेन का कथन है कि ‘जब तक सच जूते पहनता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का चक्कर लगा लेता है’। लेकिन पहले जब कोई अफवाह फैलती थी, तो उसे एक गांव से दूसरे गांव पहुंचने में वक्त लगता था और उस दौरान उसे रोकने की गुंजाइश होती थी। परन्तु आज एक भड़काऊ वीडियो या एक जहरीला संदेश पलक झपकते ही लाखों लोगों के दिमाग में जहर घोल देता है। सोशल मीडिया के ‘एल्गोरिदम’ भी कुछ इस तरह काम करते हैं कि वे हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं या जो हमें उत्तेजित करता है। यह ‘इको चैंबर’ हमें इस भ्रम में रखता है कि दुनिया में सिर्फ हमारी ही सोच सही है और बाकी सब हमारे दुश्मन हैं। जब इंसान को लगातार यह महसूस कराया जाता है कि उसका धर्म, उसकी जाति या उसकी पहचान खतरे में है, तो उसके भीतर का डर गुस्से में बदल जाता है और यही गुस्सा अंततः हिंसा का रूप ले लेता है।

तकनीक के साथ-साथ, हमारी राजनीति का बदलता स्वरूप भी इस उन्माद के लिए एक बहुत बड़ा जिम्मेदार कारक है। लोकतंत्र में राजनीति का उद्देश्य समाज को दिशा देना और विकास के रास्ते पर ले जाना होता है, लेकिन जब राजनीति का एकमात्र उद्देश्य सत्ता हासिल करना बन जाता है, तो समाज के टुकड़े करना सबसे आसान शॉर्टकट लगता है। दुर्भाग्यवश, आज की राजनीति मुद्दों को छोड़ भावनाओं पर आधारित हो गई है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए नफरत का सहारा लिया जाता है। नेताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ भाषण और एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की रणनीति ने आम आदमी के मन में अविश्वास की गहरी खाई खोद दी है। जब एक साधारण नागरिक को यह यकीन दिला दिया जाता है कि उसकी गरीबी या उसकी परेशानियों का कारण ‘वो दूसरे लोग’ हैं, तो वह अपनी सारी कुंठा उन ‘दूसरों’ पर निकालने के लिए तैयार हो जाता है। यह ‘हम बनाम वो’ का खेल समाज की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है। यह समझना जरूरी है कि भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता लेकिन उस भीड़ को उकसाने वाले दिमाग बहुत शातिर होते हैं जो सुरक्षित कमरों में बैठकर तमाशा देखते हैं, जबकि सड़क पर मरने और मारने वाला आम इंसान होता है।

इस आग में घी डालने का काम मुख्यधारा का मीडिया भी पुरजोर तरीके से कर रहा है। मीडिया कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था। उसका काम सत्ता से सवाल पूछना और समाज को दिशा दिखाना होता था, पर आज वह खुद ही एक पक्षकार बन गया है। शाम होते ही टेलीविजन स्क्रीन पर जो बहसें शुरू होती हैं, उनका उद्देश्य किसी निष्कर्ष पर पहुंचना तो बिल्कुल भी नहीं है। शोर मचाना और नफरत का तापमान बढ़ाना उनकी आदत हो गयी है। एंकर अब न्यायाधीश की भूमिका में नजर आते हैं। बहसों को जानबूझकर इतना उत्तेजक बनाया जाता है ताकि देखने वाले का खून खौलने लगे। टीआरपी की इस अंधी दौड़ में नैतिकता कहीं पीछे छूट गई है। हिंसा की घटनाओं को ग्लोरिफाई करना, अपराधियों को नायक की तरह पेश करना और पीड़ितों की जाति या धर्म देखकर खबरों का चयन करना अब आम बात हो गई है। जब समाज को दिन-रात नफरत की खुराक पिलाई जाएगी, तो उससे शांति की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मीडिया ने संवाद की संभावनाओं को खत्म कर दिया है और उसकी जगह चिल्लाने को एक संस्कृति बना दिया है।

इसके अलावा, हमारी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों में आया बदलाव भी कम जिम्मेदार नहीं है। हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या सफल व्यवसायी बनाने की दौड़ में तो शामिल हैं, लेकिन उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने की प्रक्रिया कहीं रुक गई है। स्कूलों में हम प्रतिस्पर्धा सिखा रहे हैं, सहयोग नहीं। इतिहास को पढ़ाने का तरीका ऐसा हो गया है कि वह अतीत के घावों को भरने के बजाय उन्हें कुरेदने का काम कर रहा है। परिवारों में अब संवाद कम होता है। पहले दादी-नानी की कहानियों में नैतिकता और सहिष्णुता का पाठ होता था, लेकिन अब बच्चे मोबाइल स्क्रीन पर हिंसक वीडियो गेम खेलकर बड़े हो रहे हैं। जब बचपन से ही हिंसा को मनोरंजन के रूप में परोसा जाएगा, तो बड़े होकर वे संवेदना की भाषा कैसे समझेंगे? हमने एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जिसके पास सूचनाओं का भंडार तो है, लेकिन विवेक की भारी कमी है। विवेक के बिना ज्ञान एक खतरनाक हथियार होता है। दूसरे के दुख को महसूस करने की क्षमता हमारे समाज से तेजी से गायब हो रही है। सड़क पर कोई घायल पड़ा हो तो लोग मदद करने के बजाय उसका वीडियो बनाना ज्यादा जरूरी समझते हैं। यह संवेदनहीनता ही हिंसा के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती है।

आर्थिक असमानता और भविष्य की अनिश्चितता भी युवाओं के भीतर भरे इस बारूद का एक महत्वपूर्ण घटक है। जब एक बड़ा युवा वर्ग अपने पास डिग्रियां होने के बावजूद रोजगार के लिए भटकता है, तो उसके भीतर एक गहरा असंतोष जन्म लेता है। यह खालीपन और हताशा उसे किसी ऐसी विचारधारा या समूह की ओर धकेलती है जो उसे एक उद्देश्य और पहचान देने का वादा करता है, भले ही वह उद्देश्य हिंसात्मक ही क्यों न हो। उन्मादी भीड़ में शामिल होकर उसे एक क्षणिक शक्ति का अहसास होता है, जो उसे अपनी असल जिंदगी की बेबसी से कुछ देर के लिए दूर ले जाती है। सिस्टम की नाकामी और न्याय मिलने में होती देरी भी लोगों को कानून हाथ में लेने के लिए उकसाती है। जब आम आदमी को यह लगने लगता है कि पुलिस और प्रशासन निष्पक्ष नहीं हैं या अमीरों और रसूखदारों के आगे नतमस्तक हैं, तो उसका कानून के राज पर से भरोसा उठ जाता है। यह अविश्वास ही ‘मॉब लिंचिंग’ जैसी घटनाओं को जन्म देता है, जहां भीड़ खुद ही अदालत बन जाती है और सड़क पर ही फैसला सुना देती है।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हमने संवाद की कला को भुला दिया है। असहमति को शत्रुता मान लेना हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि इसमें अलग-अलग विचारों के लिए जगह होती है। लेकिन आज अगर कोई हमसे अलग राय रखता है, तो हम उसे सुनने या समझने के बजाय उसे गद्दार या दुश्मन घोषित कर देते हैं। सहिष्णुता को कमजोरी माना जाने लगा है और आक्रामकता को वीरता। यह वैचारिक संकीर्णता हमें कुएं के मेंढक जैसा बना रही है। धर्म, जो इंसान को जोड़ने और शांति का मार्ग दिखाने के लिए था, आज उसका इस्तेमाल भी राजनीतिक रोटियां सेकने और नफरत फैलाने के लिए किया जा रहा है। धर्म के असली मर्म को समझने वाले लोग हाशिए पर हैं और धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वाले लोग मंचों पर काबिज हैं।

इस भयावह स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। इसके लिए सबसे पहले हमें ‘ठहरना’ सीखना होगा। सोशल मीडिया पर उंगली चलाने से पहले हमें अपने दिमाग का इस्तेमाल करना होगा। हर खबर, हर फॉरवर्ड संदेश पर सवाल उठाने की आदत डालनी होगी। क्या यह सच है? इससे किसका फायदा होगा? क्या इससे समाज में शांति आएगी या आग लगेगी? ये सवाल हमें खुद से पूछने होंगे। दूसरी और सबसे अहम बात यह है कि हमें अपने पूर्वाग्रहों के चश्मे उतारने होंगे। हमें यह समझना होगा कि कोई भी धर्म, जाति या समुदाय पूरा का पूरा बुरा या अपराधी नहीं होता। अपराध व्यक्ति करता है, समुदाय नहीं। इसलिए किसी एक की गलती की सजा पूरी कौम को देने की मानसिकता से हमें बाहर निकलना होगा।

सरकारों और प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। नफरत फैलाने वाले चाहे किसी भी पक्ष के हों, उन पर बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का डर होना जरूरी है, लेकिन वह डर चुनिंदा लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर उस शख्स के लिए होना चाहिए जो समाज की शांति भंग करता है। साथ ही, शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें अपने पाठ्यक्रमों में ‘मूल्य-आधारित शिक्षा’ को शामिल करना होगा। बच्चों को यह सिखाना होगा कि सफलता का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनना भी है। तर्कशक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना होगा ताकि वे अंधभक्ति और अफवाहों के जाल में न फंसें।

मीडिया को भी आत्मचिंतन करना होगा। उन्हें यह तय करना होगा कि वे इतिहास में किस रूप में याद किए जाना चाहते हैं- समाज को जलाने वाले के रूप में या उसे सही राह दिखाने वाले के रूप में। दर्शकों के रूप में हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम ऐसे चैनलों और अखबारों का बहिष्कार करें जो नफरत परोसते हैं। जब तक हम जहर को खरीदना बंद नहीं करेंगे, तब तक उसका व्यापार चलता रहेगा।

अंततः, बदलाव की शुरुआत ‘मैं’ से होती है। हम दुनिया को तब तक नहीं सुधार सकते जब तक हम खुद को नहीं सुधारते। हमें अपने घरों में, अपने आस-पास और अपने कार्यस्थलों पर संवाद के पुल बनाने होंगे। अगर हम अपने पड़ोसी से सिर्फ इसलिए बात नहीं करते क्योंकि उसका धर्म या विचार हमसे अलग है, तो हम भी इस नफरत के भागीदार हैं। हमें उस भारत को याद करना होगा जिसकी बुनियाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पर टिकी है। हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकती और नफरत को नफरत से नहीं काटा जा सकता। अंधेरे को सिर्फ रोशनी से ही मिटाया जा सकता है और नफरत को सिर्फ प्रेम और समझदारी से। हमें उन आवाजों को बुलंद करना होगा जो शांति, प्रेम और भाईचारे की बात करती हैं। समाज एक जहाज की तरह है; अगर इसमें कोई भी छेद करेगा, तो डूबेंगे हम सब। इसलिए, इस उन्माद के खिलाफ खड़े होना किसी एक की नहीं बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। आने वाली नस्लें हमसे यह सवाल जरूर पूछेंगी कि जब समाज जल रहा था, तब हम क्या कर रहे थे ?

महेश  सिंह शोधार्थी, (सीनियर

 रिसर्च फेलो) 

हिंदी विभाग 
पांडिचेरी (केंद्रीय) विश्वविद्यालय आर. वी. नगर., पुद्दुचेरी -605014 Gmail:gguhindi@gmail.com

हमारी पत्रकारिता का समर्थन करें

आपका योगदान हमें ईमानदारी के साथ रिपोर्टिंग करने, कवरेज को मजबूत बनाए रखने, स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने और हर दिन विश्वसनीय जानकारी पहुँचाने में मदद करता है।

Ad 2

ताज़ा ख़बरें

Ad Demo